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ठाट

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ठाट को कुछ विद्वान थाट भी कहते हैं

सप्तक के शुद्ध, कोमल और तीव्र बारह स्वरों मैं से किन्हीं सात स्वरों का वह समूह, जिससे रागों की उत्पत्ति हो सके, उसे ठाट कहते हैं

प॰ व्यंकटमुखी के मतानुसार सप्तक के बारह स्वरों में से 72 ठाट बन सकते हैं ; उन 72 ठाटों में से उत्तरी संगीतपद्धति में केवल 10 ठाट प्रचलित हैं, उन्हीं 10 ठाटों से सब प्रकार के रगों की उत्पत्ति की जाती है

 उत्तरी संगीतपद्धति के दस ठाट

1.  बिलावल ठाट

2.  कल्याण ठाट

3.  खमाज ठाट

4.  भैरव ठाट

5. मारवा ठाट

6. काफ़ी ठाट

7.  पूर्वी ठाट

8. आसावरी ठाट

9. भैरवी ठाट

10.  तोड़ी ठाट

ठाटों के विषय में स्मरणीय बातें :-

1. प्रत्येक ठाट में 7 स्वरों का होना आवश्यक है।

2. दक्षिणी पद्धति के आधार पर ठाटों में स्वरों के दोनो रूप, अर्थात शुद्ध और कोमल भी एक साथ लग सकते हैं, परंतु उत्तरी पद्धति के ठाटों में  एक स्वर का एक रूप ही लगता है।

3. ठाटों में स्वर क्रमानुसार  होने चाहिए, जैसेस रे ग म प ध नी, और कोई स्वर वक्र रूप से या आगेपीछे से ना लगे

4. ठाट गाये नहीं जाते, इसलिए ठाटों में रंजकता का होना आवश्यक नहीं। ठाट तो केवल स्वरों का ऐसा  समूह है, जिनसे रगों की उत्पति होती है और राग गायेबजाए जाते हैं।

5. ठाटों के आरोह तथा आवरोह में एक जैसे ही स्वर लगते हैं और इनके आरोह तथा आवरोह अलगअलग नहीं होते।

6. ठाटों के नाम से उत्पन होने वाले रागों में से किसी राग के नाम पर ठाट का नाम रखा जाता है। जैसे बिलावल ठाट से उत्पन होने वाले बिलावल राग के नाम पर शुध स्वरों के ठाट का नाम बिलावल ठाट रखा गया है।

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